Thursday, December 31, 2015

#live life


लाओत्से कहता है, जीवन को मूल्य दो। अहोभाग्य है कि तुम जीवित हो। और कोई चीज मूल्यवान नहीं है; जीवन मूल्यवान है। जीवन को तुम किसी चीज के लिए भी खोने के लिए तैयार मत होना, क्योंकि कोई भी चीज जीवन से ज्यादा मूल्यवान नहीं है।

लेकिन तुम जीवन को तो किसी भी चीज पर गंवाने को तैयार हो। एक आदमी ने गाली दे दी; तुम तैयार हो कि अब चाहे जान रहे कि जाए! इस आदमी ने किया ही क्या है? एक गाली पर तुम जीवन को गंवाने को तैयार हो? धन कमा कर रहेंगे, चाहे जान रहे कि जाए।

मुल्ला नसरुद्दीन के घर में चोर घुसे और उन्होंने छाती पर उसके बंदूक रख दी और कहा कि चाबी दो, अन्यथा जीवन! मुल्ला ने कहा, जीवन ले लो; चाबी न दे सकूंगा। चोर भी थोड़े हैरान हुए; कहा, नसरुद्दीन! थोड़ा सोच लो, क्या कह रहे हो? उसने कहा, जीवन तो मुझे मुफ्त मिला था; तिजोड़ी के लिए मैंने बड़ी ताकत लगाई, बड़ी मेहनत की। जीवन तुम ले लो; चाबी मैं न दे सकूंगा। और फिर यह भी है कि तिजोड़ी तो बुढ़ापे के लिए बचा कर रखी है। जीवन भला ले लो, चलेगा; तिजोड़ी असंभव।

कहां-कहां तुम जीवन को गंवा रहे हो, थोड़ा सोचो। कभी धन के लिए, कभी पद के लिए, प्रतिष्ठा के लिए। जीवन ऐसा लगता है, तुम्हें मुफ्त मिला है। जो सबसे ज्यादा बहुमूल्य है उसे तुम कहीं भी गंवाने को तैयार हो। जिससे ज्यादा मूल्यवान कुछ भी नहीं है, उसे तुम ऐसे फेंक रहे हो जैसे तुम्हें पता ही न हो कि तुम क्या फेंक रहे हो। और क्या कचरा तुम इकट्ठा करोगे जीवन गंवा कर ?


जीवन के लिए तुम्हारे पास फुर्सत ही नहीं है। जीवन के स्वर को केवल वे ही सुन सकते हैं जो बड़ी गहरी फुर्सत में हैं; काम जिन्हें व्यस्त नहीं करता।
और काम व्यस्त करेगा भी नहीं, अगर तुम आवश्यकताओं पर ही ठहरे रहो। काम की व्यस्तता आती है वासना से। कमा लीं दो रोटी, पर्याप्त है। फिर तुम पाओगे फुर्सत जीवन को जीने की। अन्यथा आपाधापी में सुबह होती है सांझ होती है, जिंदगी तमाम होती है। मरते वक्त ही पता चलता है कि अरे, हम भी जीवित थे! कुछ कर न पाए। ऐसे ही खो गया; बड़ा अवसर मिला था!


जय श्री कृष्णा......



Wednesday, December 30, 2015

बूढ़ी औरत vs संतरे

एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता, अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता, ये कम मीठा लग रहा है, देखो !

बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती, ना बाबू मीठा तो है..

वो उस संतरे को वही छोड़, बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता..

युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा, ये संतरे तो हमेशा मीठे ही होते हैं, फिर यह नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?

युवा ने पत्नी को एक मघुर मुस्कान के साथ बताया, वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती, इस तरह उसे मै संतरे खिला देता हूँ, उसके संतरे भी बिकते है और उसमें से अंततः एकाद उसे भी खाना नसीब हो जाता है और नुक्सान भी नहीं होगा..

बुढ़िया के पड़ोस में बैठी सब्जी वाली भी रोज का यह माज़रा देखती..

एक दिन, बूढ़ी माँ से उस सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया, ये झक्की लड़का संतरे लेते इतना चख चख करता है, रोज संतरों में नुस्ख निकालता है, तुझे भी चखाता है, पर संतरे तौलते समय मै तेरे पलड़े देखती हूँ, तू हमेशा उसकी चखने की झक्की में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है..

ऐसे लड़के के पीछे क्यों अपना नुक्सान करती हो?

तब बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा, उसका चखना, संतरे के लिए नहीं,
मुझे संतरा खिलानें को लेकर होता है, बस इतना ही है की वो समझता है में उसकी यह बात समझती नही..

लेकिन मै बस उसका प्रेम देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे तो अपने आप बढ़ जाते हैं..

विस्वास कीजिये कभी कभी जीवन का आनंद इन्हीं छोटी छोटी बातों में आता है..

पैसे नहीं दूसरों के प्रति प्रेम और आदर ही जीवन में मिठास घोलता है..

देने में जो सुख है वह छीनने और पाने में नहीं..

खुशियां बांटने से बढ़ेंगी ही, नुक्सान नहीं होगा..

Agree?


जय श्री कृष्णा......

Love, light & Peace

Many of you are waiting for Shiva to answer your prayers, but still things are not happening the way you hoped or expected them to.

Sometimes it's hard to understand why HE doesn't allow things to happen straightaway. What you must continue to learn each day is that God works things out in his own perfect timing. Trusting in him is the key to success and happiness in life. Never expect the fruit, just do your duty and stay content. Love him, spend time with him, pray constantly, if you live your life this way, your mind will be directed only towards him and you will not be effected by happiness or even pain .

He will fulfill your desires but know that it will take a time. Commit your hopes and dreams to God. And always remember HE loves you. He will work things out in your life if you trust him. #TheShivaTribe It is possible that you may have to go through certain rough patches. But remember all things will work together for good if you trust him. He has plans for your life, even before you came into this world.

He knows everything about you. He created you in your mothers womb. he created your inmost being. It's his duty to give you hope, it's his duty to plan your  future. And he has already written all your days in your destiny. And you worry unnecessarily?? Everything on earth is temporary. Our goal should be to stop worrying about material things and just seek him while we are living and just wait for his perfect timing. With time, you will know his answers. You will realise he has been directing your life for your good, with what's best for you. Don't speed up things and mess them up.

There is right time for everything. "God's answer to your prayer is maybe to wait for a time before he works out things"'. Everything that comes from Bholenath is worth waiting for. So be encouraged. Be patient. Trust in HIM. Talk to HIM today and ask Him to give you strength to sail smoothly. If it helps write your prayer down and offer it to Lord in Mandir. Stay strong. And keep taking next step, keeping in mind that yes he is ever protecting you, no matter what!!

Love, light & Peace



जय श्री कृष्णा......

father and daughter

पिता बेटी के सर पर
हाथ रख कर बोला- मैं तेरे
लिए ऐसा पति
खोज
कर लाऊंगा जो तुझे बहुत
प्यार करे,
तेरी भवनाओं का सम्मान
करे,
तेरे दुख सुख को समझ सके,
तेरी आँखो में आँसू न आने दे,
तेरी हर छोटी छोटी
ख्वाइशों को पूरा कर सके।
बेटी ने पूछा : क्यो पापा?
पिता बोला : बेटा हर
बाप का सपना होता है
की
उसकी बेटी को राजकुमार
जैसा पति
मिले जो उसे बहुत प्यार दे
और
उसे हमेशा सुखी रखे।
बेटी :-तो पापा नाना
जी ने भी आपको
मम्मी का हाथ यही
सोचकर दिया
होगा न की आप भी
राजकुमार हो।
फिर आप मम्मी को हमेशा
क्यो रुलाते हो?,
कही बाहर भी नही ले
जाते
और प्यार भी नही करते
और
हमेशा चिल्लाते रहते हो
तो
क्या आप अच्छे वाले
राजकुमार नही निकले?
ये सुन पिता को एहसास
हुआ की
मुझे भी किसी ने
राजकुमार
समझ कर अपने कलेजे
का टुकड़ा दिया और मैं खुद
तो
राजकुमार बना रहा पर
अपनी
पत्नी को कभी
राजकुमारी नही समझा।
आज खुद बाप बंनने के बाद
एह्सास हुआ की अपने दिल
के टुकड़े को सही हाथ मे
नही सौपा
तो उसके दिल के टुकड़े हो
जायेगे जो कोई भी बाप
नही सहेगा।
इसलिए जैसा आप अपनी
बेटी
के लिए सोचते है वैसा ही
अपनी
पत्नी के लिए सोचिये।
आखिर वो भी किसी की
बेटी है,
किसी का आँख का तारा
है।
उसे दुख होगा तो उसके
पिता को
भी दुख होगा।
कृप्या कर अपनी घर की
औरतों को भी इज़्ज़त और
प्यार दिजिए वो
भी किसी की बेटी है।


dedicated to all
daughters in the world

Tuesday, December 29, 2015

love and heart

प्रेम के लिए दो प्यार भरे दिल चाहिए होते है......

एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता ।
अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता, "ये कम मीठा लग रहा है, देखो !" बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!"
वो उस संतरे को वही छोड़, बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता।
युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा "ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ?"
युवा ने पत्नी को एक मघुर मुस्कान के साथ बताया "वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती, इस तरह उसे मै संतरे खिला देता हूँ ।
एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया, ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है, पर संतरे तौलते मै तेरे पलड़े देखती हूँ, तू हमेशा उसकी चख चख में, उसे जादा संतरे तौल देती है ।
बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा "उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर होती है, वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं ।



जय श्री कृष्णा......

parents vs child

A extract from writer Sujatha’s biography. A must read. Good one.

For all parents who force their children to study. Is life just dangling in future alone??

I recently got an E-mail. It’s from a worried father of two sons. He is a successful central government employee. Starting his career as a fresher and completed his whole career as a senior officer before retiring. He has two sons. Both of them well settled with their family. One is living in America, and the another one living in Australia. He is living along with his wife, in his native city, Trichy. His only problem is severe depression from loneliness. His wife is suffering from arthritis, and he has Asthma and they can’t settle in colder countries with their sons. Their sons rarely visit them. Even for two years, they wouldn't visit once. Even if they do, they would stay hardly for 5days and that too, would hardly spend 5 hours with them.

My second son likes to read a lot of your books. He buys them when he visits India. If you could write an email to him, explaining our state, he might understand us. He requested. I generally don’t get into other's family problem. But when he insisted, I just forwarded his mail to his son.

After a week's delay, there was response from his son. A lengthy email that made me think a lot about present education and its psychological effects. His son's mail read as, "I lived in Trichy for 22 whole years. But I don’t have any bonding with my native town. For 22years, I have been with my parents. But I don’t have any sweet memories of them. My father, has always planned to make me an Engineer. He even planned it right before my LKG.

Every day, he would sit along and teach lessons. After that my mother would. Studying in the school, than studying in the home, it’s all the only memories of my childhood that I carry around. Even during leaves, even on summer holidays, its English Grammar and Maths Algebra. Even for festivals like Pongal, and Dewali, there's nothing for me to celebrate, just studying.

Sometimes, I would lie down and think. If I have anything to remember from my childhood.  Anywhere, any happy occasion. Nothing. Atleast If I got any bad occasion, to remember. Nothing. Its just plain studying, studying, studying.

My school is worse than that. It’s a private school. It is ranked best for squeezing my childhood into marks. People would stand in queues even to get admission. There were teachers to assist us the moment we enter the school and would stay with us till we leave the campus. There's no way, they would let me laugh or play. It’s just study, study, study.

Even in that, study, I have nothing to amuse myself. I didn’t learn anything out of the box from that education. None introduced me to novels or art. Only thing they taught me is to xerox the whole text with just my memory and write on the exam papers.

After finishing my graduation in the same way, and getting employed in America, I just figured out on my own, how happy life can be. Travelling, meeting friends, reading novels, hearing music, were all making me very happy. Our mind, just remembers the place, where it is very happy. It assumes that, that place is our native. That’s, how I love the cities in America more than Trichy. Now Trichy is like a strange city to me. I can’t stay for more than a day in it.

I have respect for my parents. I am grateful to them. I understand them. But I can’t talk for more than half an hour with them. For 22 years, they hid this world and made me study. Nothing more I can think about them. If I am to love them, I should have understood them. I just see them as strangers.

For the 22years, I have been with them, we never had any general discussions. They only frighten me with their fears, studies, and my future. Even If I force myself to speak with them, I have nothing to talk. Even now, they frighten me with questions, like, how much I earn and what are my savings plan. They ask me not to travel, and not to buy books. They are asking me to live their life.

Now tell me, How do you expect me to talk with, when we don’t even have common interests to discuss even for 1/2 hour. Even if I try artificially, I can’t. How do you expect me to stay in a city that has long become strange for me. I can force myself for 5 days, for the gratitude and respect. What can I do after that." I forwarded that mail as such to his father. His father just read that mail and didn’t understand a bit. Out of his own frustration, he replied, that his son is disrespectful and irresponsible. After a month, he just mailed, me saying, If I could call his son for Dewali.

Dewali is a celebration for children. Children like it a lot. When we grow up, we celebrate less and just carry the happy memories of the childhood celebrations. Your son says, he doesn’t have any such memories. You have taken away all his enjoyment and colorfulness from his life. I replied. He never wrote back any mail. Life is not a struggle for securing the future. It is to make every minute memorable with colors. It is for that same reason, we have festivals and celebrations. It is what our ancestors framed for us.

Tomorrow is important. But today is more important.


जय श्री कृष्णा......

THE BLACK SPOT



One day a professor entered the classroom and asked his students to prepare for a surprise test. They waited anxiously at their desks for the test to begin. The professor handed out the question paper, with the text facing down as usual. Once he handed them all out, he asked his students to turn the page and begin. To everyone’s surprise, there were no questions….just a black dot in the center of the page. The professor seeing the expression on everyone’s face, told them the following:

“I want you to write what you see there.”

The students confused, got started on the inexplicable task.

At the end of the class, the professor took all the answer papers and started reading each one of them aloud in front of all the students. All of them with no exceptions, described the black dot, trying to explain its position in the middle of the sheet, etc. etc. etc. After all had been read, the classroom silent, the professor began to explain:

“I am not going to grade on you this, I just wanted to give you something to think about. No one wrote about the white part of the paper. Everyone focused on the black dot – and the same happens in our lives. We have a white paper to observe and enjoy, but we always focus on the dark spots. Our life is a gift given to us by God, with love and care, and we always have reasons to celebrate – nature renewing itself everyday, our friends around us, the job that provides our livelihood, the miracles we see everyday…….

However we insist on focusing only on the dark spots – the health issues that bother us, the lack of money, the complicated relationship with a family member, the disappointment with a friend etc

The dark spots are very small compared to everything we have in our lives, but they are the ones that pollute our minds.

Take your eyes away from the black spots in your life. Enjoy each one of your blessings, each moment that life gives you.

Be happy and live a life positively!


जय श्री कृष्णा......

चित्त दर्पण बन जाए तो आदमी मंदिर बन सकता है।

एक अंधेरी रात में, एक चर्च पर, एक नीग्रो ने जाकर द्वार खटखटाया। चर्च के पादरी ने द्वार खोला। काश! उसे पता होता कि एक काला आदमी द्वार-घंटी बजा रहा है , तो वह द्वार भी न खोलता। क्योकि वह चर्च जो था सफेद चमड़ी के लोगो का चर्च था। अब तक जमीन पर आदमी ऐसा मन्दिर नही बना पाया जो सबका हो। और जो मन्दिर सबका नही है वह परमात्मा का कैसे हो सकेगा?

सफेद चमड़ी के लोगों के मन्दिर है, काली चमड़ी के लोगो के मन्दिर है; हिन्दुओं के मन्दिर है; मुसलमानों के
मन्दिर है; जैनों के मन्दिर है; लेकिन मनुष्य का कोई मन्दिर नही। वह मन्दिर भी मनुष्य का नही था। दरवाजा खोला तो देखा एक नीग्रो खड़ा है, काला आदमी!
पुराने दिन होते तो उसे कहा होता: हट शुद्र यहाँ से भगवान के मन्दिर में तेरे
लिए कोई जगह नही है! और पुराने दिन होते तो शायद
उसकी गर्दन कटवा देता, या उसके कानों में शीशा पिघलवा कर भरवा देता कि तू इस मन्दिर के आस-पास क्यों आया। लेकिन जमाना
बदल गया है, तो उस चर्च के पादरी को उसे प्रेम से समझा कर लौटा देना पड़ा। उसने नीग्रो को कहा : मेरे मित्र, किसलिए मंदिर में आना चाहते हो?
उसने कहा : मन है मेरा दुखी, चित्त है मेरा पीड़ित और चिंताओ से भरा। शांत होना चाहता हूँ। जीवन बीत गया मालूम होता है और कुछ भी मैने पाया नही। भगवान की शरण चाहता हूँ। यह एक
ही मंदिर है गाँव में, मुझे भीतर आने दो, भगवान का सान्निध्य मिलने दो।
उस पादरी ने कहा : मित्र, जरुर आने दूंगा। लेकिन जब तक मन शुद्ध न हो, चित्त पवित्र न हो, प्राण शांत न हो, आत्मा ज्योति से न भर जाए, तब तक भगवान से मिलना नहीं हो सकेगा। आकर
भी क्या करोगे? जाओ और पहले अपने मन को शुध्द करो और शांत करो, हृदय को प्रार्थना और प्रेम से भरो, फिर आना। फिर मैं तुम्हें भीतर प्रवेश दूंगा।
वह नीग्रो वापस लौट गया। उस पादरी ने सोचा : न
होगा कभी इसका मन शांत और न यह दुबारा कभी
आएगा।
लेकिन कोई दो-तीन महीने बीत जाने के बाद एक दिन बाजार में उस पादरी ने देखा कि वह नीग्रो चला जा रहा है। लेकिन वह तो आदमी दूसरा
हो गया मालूम पड़ता है। उसकी आँखों में कोई नई
रोशनी, कोई नई झलक। उसके पैरों की चाल बदल
गई है, उसके चारों तरफ कोई वायुमंडल ही और हो गया है, उसके ओंठो पर कोई और ही मुस्कुराहट है जो इस जमीन की नहीं है।| तो उसने उस
नीग्रो को पूछा और कहा कि तुम वापस नहीं आए?
वह नीग्रो हंसने लगा और उसने कहा : मैें तो आना चाहता था।
और उसी आने के लिए मेैंने प्रार्थनाएं की, एक रात जब में प्रार्थना कर सो गया ,तो मेैंने सपना देखा कि भगवान खड़े हैं। और मुझसे पूछ रहे है कि क्यों तू मुझे पुकार रहा है? तो मेैंने कहा कि जो हमारे गाँव
का मंदिर है, चर्च है, मैं उसमें प्रवेश पाना चाहता हूँ, इसके लिए प्रार्थनाएं कर रहा हूँ। तो भगवान हंसने लगे और, और बोले: तू बड़ा पागल है! यह
ख्याल छोड़ दे। दस साल से मैें खुद उस चर्च में घुसने की कोशिश कर रहा हूँ, वह पादरी मुझे भी नहीं घुसने देता! तू यह ख्याल छोड़ दे।
और सच्चाई तो यह है कि उस मंदिर में ही नहीं, आज तक किसी मंदिर में किसी पुरोहित ने भगवान को प्रवेश नहीं पाने दिया। आज तक जमीन पर कोई मंदिर भगवान का घर नहीं बन सका। कई कारण है न बनने के।

पहली बात, भगवान प्रेम है और हमारे सब मंदिर व्यवसाय है। प्रेम का और व्यवसाय से क्या सम्बन्ध हो सकता है? जहाँ व्यवसाय है,
वहां प्रेम का कोई प्रवेश नही।

दुसरी बात, सभी मंदिर आदमी के बनाए हुए है। भगवान आदमी का बनाया हुआ नहीं है। आदमी की बनाई हुई चीज में भगवान का प्रवेश असंभव है।

तीसरी बात, आदमी जो भी बनाएगा, आदमी से छोटा होगा। बनाने वाले से बनाई गई चीज बड़ी नहीं हो
सकती। स्रष्टा से बड़ी उसकी
सृष्टि नहीं हो सकती। आदमी खुद ही बहुत छोटा और क्षुद्र है, उसके बनाये हुए मंदिर और भी छोटे और क्षुद्र है। और परमात्मा है विराट, असीम।

लेकिन जिन लोगों को यह ख्याल पैदा होता है कि हम सत्य की खोज करें, वे किन्हीं मंदिरों में उस खोज को करने लगते है। इससे बड़ी भूल और कोई दुसरी नही हो सकती। सत्य की खोज करनी हो, तो खुद को मंदिर बनाना होगा, इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है। कोई
जमीन पर मंदिर नहीं है जहाँ सत्य की खोज हो सके। हाँ, हर आदमी खुद मंदिर बन
सकता है, जहाँ भगवान का प्रवेश हो सके, और यह खुद
आदमी मंदिर कैसे बन जाए? चित्त दर्पण बन जाए तो आदमी मंदिर बन सकता है। चित्त दर्पण बन जाए तो आदमी इसलिए मंदिर बन सकता है कि उसी दर्पण में भगवान की छवि उतरनी शुरू हो जाती है।


जय श्री कृष्णा......


सागरों में डूबो।

लुटना हो तो परमात्मा के हाथों लुटो। छोटी-छोटी बातों में लुट गए! चुल्लू-चुल्लू पानी में डूबकर मरने की कोशिश की, मरे भी नहीं, पानी भी खराब हुआ, कीचड़ भी मच गई, अब बैठे हो।

अब मैं तुमसे कहता हूं, डूबो सागर में। तुम कहते हो, हमें डूबने की बात ही नहीं जंचती क्योंकि हम डूबे कई दफा। डूबना तो होता ही नहीं, और कीचड़ मच जाती है।

वैसे ही अच्छे थे। चुल्लू भर पानी में डूबोगे तो कीचड़ मचेगी ही। सागरों में डूबो। सागर भी है।




जय श्री कृष्णा......

#The buddhist and the hindu Tantra


The buddhist and the hindu Tantra are totally different things. Just the name is the same. If you are confused about them, that can create a very deep conflict in your body. Forget both, mm? because it will be difficult for you to come to a harmony between these two. I will give you a simple method. Don't be bothered about hindu and buddhist Tantra.

While making love, three things have to be remembered. One is: before you make love, meditate. Never make love without meditating, otherwise the love will remain sexual. Before you meet the woman you should rise higher in your consciousness because then the meeting will happen on a higher plane. For at least forty minutes sit looking at the wall with just a very dim light on so that it gives a mysteriousness.

Sit silently and don't move the body; remain like a statue. Then when you make love, the body will move, so give it another extreme of first being unmoving so the body gathers momentum to move deeply. Then the urge becomes so vibrating that the whole body, every fibre is ready to have a movement. Then only tantric orgasm is possible. You can have some music on... classical music will do; something that gives a very subtle rhythm to the body.

Make the breathing as slow as possible because when you make love the breathing will go deep and fast. So just go on slowing down, but don't force it, otherwise it will go fast. Simply suggest that it slows down.

Both meditate together and when you are both feeling meditative, that is the moment to love. Then you will never feel tension and energy will be flowing. If you are not feeling meditative, don't make love. If meditation is not happening that day, forget all about love.

People do simply the opposite. Almost always couples fight before they make love. They become angry, nag each other and bring all sorts of conflict -- and then they make love. They fall very low in their consciousnesses, so of course love cannot be very satisfying. It will be frustrating and you will feel a tension.

The second thing is: when you are making love, before you start, worship the partner and let the partner worship you. So after meditation, worship. Face each other totally naked and worship each other, because Tantra cannot be between man and woman. It can only be between a god and a goddess. It is a gesture, but very significant. The whole attitude has to become sublime so that you disappear. Touch each other's feet, put garlands of flowers there.

The man becomes transformed into Shiva and the woman is transformed into Shakti. Now your humanity is irrelevant, your form is irrelevant, your name is irrelevant; you are just pure energy. Worship brings that energy into focus. And don't pretend. The worship has to be true. It cannot be just a ritual, otherwise you will miss. Tantra is not a ritual. There is much ritual in it, but Tantra is not ritual.

You can repeat the ritual. You can bow down to her feet and touch them; that won't help. Let it be a deeply meaningful gesture. Really look at her. She is no more your wife, no more your girlfriend, no more woman, no more body, but a configuration of energy. Let her first become divine, then make love to her. Then love will change its quality. It will become divine. That's the whole methodology of Tantra.

Then in the third step you make love. But let your making love be more like a happening than like a making. The english expression 'making love' is ugly. How can you make love? It is not something like doing; it is not an action. It is a state. You can be in it but you cannot make it. You can move in it but you cannot do it. You can be loving but you cannot manipulate it. The whole western mind tries to manipulate everything.

Even if the western mind comes to find God someday, God will be in trouble. They will harness Him in some way or other, manipulate Him. They will put Him to some use, some utilitarian purpose. Even love has become a sort of doing. No.
When you make love, be possessed. Move slowly, touch each other's bodies; play with each other's bodies. The body is like a musical instrument. Don't be in a hurry. Let things grow. If you move slowly, suddenly both your energies will rise together, as if something has possessed you. It will happen instantly and simultaneously together. Then only Tantra is possible. Move now into love ....
Just feel energy descending on you and let that energy have its movement. Sometimes you will start shrieking, shriek. Sometimes you will start saying things, say. Sometimes only moans will be coming out, or some mudras, gestures; allow them. It is going to be a maddening thing, but one has to allow it. And don't be afraid, because it is through your allowing that it is happening. The moment you want to stop it, it stops, so you are never beyond control.

And when gods make love it is almost wild. There are no rules, no regulations. One moves just on the spur of the moment. Nothing is taboo... nothing is inhibited. Whatsoever happens in that moment is beautiful and holy; whatsoever, I say, unconditionally. If you bring your mind into it you will destroy it completely. If you suddenly feel like sucking her finger and you say 'What nonsense!' then you have brought in the mind. You may feel like sucking her breast; nothing wrong in it.

Nobody knows what is going to happen. You are simply left in the divine vortex. It will take you, and it will take you wherever it wants. You are simply available, ready to move with it. You don't direct it... yoU have simply become vehicles. Let energies meet in their own ways. The man should be dropped out of it just pure energy. You will not be making love only through the genital organs; you will be making love through your whole body.

That's the meaning of shivalingam: no face, no hands, no feet -- just the phallic symbol. When Shiva made love he became just the phallus -- the whole of his body. It is very beautiful... no face, nothing. Everything has disappeared.

It is not that you are using your sexual organs only; the sex has spread all over. You head is as much a part of it as your feet. You have become a phallus. You are no more man; you are just energy. She is also no more a woman; just energy, a vulva. It is a very wild thing.

If you meditate before and then worship each other, there is no danger; everything will move rightly. You will attain to a peak of orgasm that you have never known. Sometimes you will achieve it: a very great orgasm in which the whole body throbs and pulsates. By and by you reach a climax; again you come down. It will cleanse your whole being, the whole system. Sometimes there will be no ejaculation but orgasm will be there.

There are two types of orgasm: the peak orgasm and the valley orgasm. In the peak orgasm you will have an ejaculation and she will have also an ejaculation of some subtle energies. In the valley orgasm you will not have any ejaculation. It will be a passive orgasm... very silent, very subtle. The throb will be there but almost imperceptible. In the peak orgasm you will feel very very blissful. In the valley orgasm you will feel very very peaceful. And both are needed; both are two aspects of Tantra. Every peak has its valley, and every valley has its peak. A peak cannot exist without the valley nor vice versa.


जय श्री कृष्णा......

#Elephant Rope


As a man was passing the elephants, he suddenly stopped, confused by the fact that these huge creatures were being held by only a small rope tied to their front leg. No chains, no cages. It was obvious that the elephants could, at anytime, break away from their bonds but for some reason, they did not.He saw a trainer nearby and asked why these animals just stood there and made no attemptto get away.

“Well,” trainer said, “when they are very young and much smaller we use the same size rope to tie them and, at that age, it’s enough to hold them. As they grow up, they are conditioned to believe they can not break away. They believe the rope can still hold them, so they never try to break free.”The man was amazed. These animals could at any time break free from their bonds but because they believed they couldn’t, they were stuck right where they were.

*Like the elephants, how many of us go through life hanging onto a belief that we cannot do something, simply because we failed at it once before?Failure is part of learning; we should never give up the struggle in life.


जय श्री कृष्णा......

#भगवान से पूछा

मैंने एक दिन
भगवान से पूछा
आप मेरी दुआ
उसी वक्त
क्यों नहीं सुनते हो
जब मैं
आपसे मांगता हूँ

भगवान ने
मुस्कुरा कर के कहा
मैं तो आप के
गुनाहों की सजा भी
उस वक्त नहीं देता
जब आप करते हो


जय श्री कृष्णा......

#Think positive.....Be happy...Stay Blessed

A famous writer was in his study room. He picked up his pen and started writing :

**Last year, I had a surgery and my gall bladder was removed. I had to stay stuck to the bed due to this surgery for a long time.

**The same year I reached the age of 60 years and had to give up my favourite job. I had spent 30 years of my life in this publishing company.

**The same year I experienced the sorrow of the death of my father.

**And in the same year my son failed in his medical exam because he had a car accident. He had to stay in bed at hospital with the cast on for several days. The destruction of car was another loss.

At the end he wrote: Alas! It was such bad year !!


When the writer's wife entered the room, she found her husband looking sad lost in his thoughts. From behind his back she read what was written on the paper. She left the room silently and came back with another paper and placed it on side of her husband's writing.

When the writer saw this paper, he found this name written on it with following lines :

**Last year I finally got rid of my gall bladder due to which I had spent years in pain....

**I turned 60 with sound health and got retired from my job. Now I can utilize my time to write something better with more focus and peace.....

**The same year my father, at the age of 95, without depending on anyone or without any critical condition met his Creator.....

 **The same year, God blessed my son with a new life. My car was destroyed but my son stayed alive without getting any disability......

At the end she wrote:

This year was an immense blessing of God and it passed well !!!

 The writer was indeed happy and amazed at such beautiful and encouraging interpretation of the happenings happened in his life in that year !!!

Moral : In daily lives we must see that its not happiness that makes us grateful but gratefulness that makes us happy.


जय श्री कृष्णा......

भगवान शिव


भगवान शिव के उपासक ऋषि मृकंदु जी के घर कोई संतान नहीं थी .उन्होंने भगवान शिव की कठिन तपस्या की. भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा . उन्होंने संतान मांगी .भगवान शिव कहने लगे कि तुम्हारे भाग्य में संतान नहीं है .तुमने हमारी कठिन भक्ति की है इसलिए हम तुम्हें एक पुत्र देते हैं.उसकी आयु केवल तेरह वर्ष की होगी.

कुछ समय के बाद उनके घर में एक पुत्र ने जन्म लिया. उसका नाम मार्कंडेय रखा. पिता ने मार्कंडेय को शिक्षा के लिए ऋषि मुनियों के आश्रम में भेज दिया .बारह वर्ष व्यतीत हो गए .मार्कंडेय शिक्षा लेकर घर लौटे. उनके माता- पिता उदास थे.जब मार्कंडेय ने उनसे उदासी का कारण पूछा तो पिता ने मार्कंडेय को सारा हाल बता दिया.मार्कंडेय ने पिता से कहा कि उसे कुछ नहीं होगा.

माता-पिता से आज्ञा लेकर मार्कंडेय शिव की तपस्या करने चले गए.उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र की रचना की .एक वर्ष तक उसका जाप करते रहे. जब तेरह वर्ष पूर्ण हो गए तो उन्हें लेने के लिए यमराज आए .वे शिव भक्ति में लीन थे. जैसे ही यमराज उनके प्राण लेने आगे बढे तो मार्कंडेय जी ने शिवलिंग से लिपट गए.उसी समय भगवान शिव त्रिशूल उठाए प्रकट हुए और यमराज से कहा कि इस बालक के प्राणों को तुम नहीं ले जा सकते.हमने इस बालक को दीर्घायु प्रदान की है. यमराज ने भगवान शिव को नमन किया और वहाँ से चले गए .

तब भगवान शिव ने मार्कंडेय को कहा तुम्हारे द्वारा लिखा गया यह मंत्र हमें अत्यंत प्रिय होगा .भविष्य में जो कोई इसका स्मरण करेगा हमारा आशीर्वाद उस पर सदैव बना रहेगा.इस मंत्र का जप करने वाला मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है और भगवान शिव की कृपा उस पर हमेशा बनी रहती है.

यही बालक बड़ा होकर मार्कंडेय ऋषि के नाम से विख्यात हुआ.

अकाल मृत्यु वह मरे ,जो काम करे चंडाल का,
काल उसका क्या बिगाड़े ,जो भक्त हो महाकाल का.

जन्मकुण्डली में सूर्यादि ग्रहों के द्वारा किसी प्रकार की अनिष्ट की आशंका हो या मारकेश आदि लगने पर, किसी भी प्रकार की भयंकर बीमारी से आक्रान्त होने पर, अपने बन्धु-बन्धुओं तथा इष्ट-मित्रों पर किसी भी प्रकार का संकट आने वाला हो। देश-विदेश जाने या किसी प्राकर से वियोग होने पर, स्वदेश, राज्य व धन सम्पत्ति विनष्ट होने की स्थिति में, अकाल मृत्यु की शान्ति एंव अपने उपर किसी तरह की मिथ्या दोषारोपण लगने पर, उद्विग्न चित्त एंव धार्मिक कार्यो से मन विचलित होने पर महामृत्युंजय मन्त्र का जप स्त्रोत पाठ, भगवान शंकर की आराधना करें। यदि स्वयं न कर सके तो किसी पंडित द्वारा कराना चाहिए। इससे सद्बुद्धि, मनःशान्ति, रोग मुक्ति एंव सवर्था सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

ऊॅ हौं जूं सः। ऊॅ भूः भुवः स्वः

ऊॅ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उव्र्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

ऊॅ स्वः भुवः भूः ऊॅ। ऊॅ सः जूं हौं।




जय श्री कृष्णा......

#शमशान में दो चिताओ की राख


एक फ़क़ीर शमशान में दो चिताओ की राख को बड़े ध्यान से देख रहा था।
किसी ने पूछा कि बाबा एसे क्यू देख रहे हो राख को ।

फ़क़ीर बोला कि ये एक अमीर की लाश की राख है जिसने ज़िंदगी भर काजू बादाम खाये
और ये एक ग़रीब की लाश है जिसे दो वक़्त की रोटी भी बडी मुश्किल से मयस्सर होती थी ,

मगर इन दोनों की राख एक सी ही है फिर किस चीज़ पर आदमी को घमंड है ।


जय श्री कृष्णा......

love only





Just because things are broken in your life does not mean you can't survive. Just because a relationship or friendship ended doesn't mean you can't survive. Just because your job cut your pay doesn't mean you can't survive.

Quit trying to put what was broken back together and hold on to what's left until you get to where Shiva is trying to take you. You can make it on broken pieces.

Know that Every blessing doesn't come to stay. Every relationship wasn't meant to last. Every friend is not going to be a life long friend. Learn that Shiva gives you what you need for that season and if it leaves, don't cry over what used to be and over what was. Because if you needed it for the future it would've stayed.

No good thing Shiva will withhold from you. If He told you to leave that place or person, know that it wasn't meant to be. Be patient, in His time you will receive what's yours. Give thanks to HIM for every thing, know that for this is the will of Bholenath. So you may not have everything but thank Bholenath for what you got left with. Thank Him for the pieces. Everything in life doesn't have to be perfect.

You don't have to be perfect for Shiva to accept you, for HE loves you anyway. He loves his creations. You can make it on broken pieces! Stop focusing on what you lost and focus on what you are left with!!


जय श्री कृष्णा......


Monday, December 28, 2015

life vs train


Life is like a journey on a train...
with its stations...
with changes of routes...
and with accidents !


We board this train when we are born and our parents are the ones who get our ticket.

We believe they will always travel on this train with us.

However, at some station our parents will get off the train, leaving us alone on this journey.

As time goes by, other passengers will board the train, many of whom will be significant - our siblings, friends, children, and even the love of our life.

Many will get off during the journey and leave a permanent vacuum in our lives.

Many will go so unnoticed that we won't even know when they vacated their seats and got off the train !

This train ride will be full of joy, sorrow, fantasy, expectations, hellos, good-byes, and farewells.

A good journey is helping, loving, having a good relationship with all co passengers...
and making sure that we give our best to make their journey comfortable.

The mystery of this fabulous journey is :
We do not know at which station we ourselves are going to get off.

So, we must live in the best way - adjust, forget, forgive and offer the best of what we have.

It is important to do this because when the time comes for us to leave our seat... we should leave behind beautiful memories for those who will continue to travel on the train of life."

Thank you for being one of the important passengers on my train... don't know when my station will come... don't want 2 miss saying: "Thank you"



जय श्री कृष्णा......

#Light, Love, & Peace




Just because things are broken in your life does not mean you can't survive. Just because a relationship or friendship ended doesn't mean you can't survive. Just because your job cut your pay doesn't mean you can't survive.

Quit trying to put what was broken back together and hold on to what's left until you get to where Shiva is trying to take you. You can make it on broken pieces.

Know that Every blessing doesn't come to stay. Every relationship wasn't meant to last. Every friend is not going to be a life long friend. Learn that Shiva gives you what you need for that season and if it leaves, don't cry over what used to be and over what was. Because if you needed it for the future it would've stayed.

No good thing Shiva will withhold from you. If He told you to leave that place or person, know that it wasn't meant to be. Be patient, in His time you will receive what's yours. Give thanks to HIM for every thing, know that for this is the will of Bholenath. So you may not have everything but thank Bholenath for what you got left with. Thank Him for the pieces. Everything in life doesn't have to be perfect.

You don't have to be perfect for Shiva to accept you, for HE loves you anyway. He loves his creations. You can make it on broken pieces! Stop focusing on what you lost and focus on what you are left with!!

जय श्री कृष्णा......

#Hinduism is not just religion. Its a way of living....







CHIDAMBARA RAHASYAM
(THE SECRET)

After 8 years of R & D, Western scientists have proved that at Lord
Nataraja 's big toe is the Centre Point of World 's Magnetic Equator.

Our ancient Tamil Scholar Thirumoolar has proved this Five thousand years ago! His treatise
Thirumandiram is a wonderful Scientific guide for the whole world.

To understand his studies, it may need a 100 years for us.

Chidambaram temple embodies the following  characteristics :

1)  This temple is located at the Center Point of world 's Magnetic Equator.


2) Of the "Pancha bootha" i.e. 5 temples, Chidambaram denotes the Skies.  Kalahasthi denotes Wind.  Kanchi Ekambareswar denotes land.  All these 3 temples are located in a straight line at 79 degrees 41 minutes Longitude. This can be verified using Google.  An amazing fact & astronomical miracle !


3)  Chidambaram temple is based on the Human Body having 9 Entrances denoting 9 Entrances or Openings of the body.


4) Temple roof is made of 21600 gold sheets which denotes the 21600 breaths taken by a human being every day (15 x 60 x 24 = 21600)


5) These 21600 gold sheets are fixed on the Gopuram using 72000 gold nails which denote the total no. of Nadis (Nerves) in the human body. These transfer energy to certain body parts that are invisible.


6)  Thirumoolar states that man represents the shape of Shivalingam, which represents Chidambaram which represents Sadashivam which represents HIS dance !


7) "Ponnambalam " is placed slightly tilted towards the left.  This represents our Heart.  To reach this, we need to climb 5 steps called "Panchakshara padi "
"Si, Va, Ya, Na, Ma " are the 5 Panchakshara mantras.

There are 4 pillars holding the Kanagasabha representing the 4 Vedas.


8)  Ponnambalam has 28 pillars denoting the 28 "Ahamas "as well as the 28 methods to worship Lord Shiva.  These 28 pillars support 64 +64 Roof Beams which denote the 64 Arts.  The cross beams represent the Blood Vessels running across the Human body.


9)  9 Kalasas on the Golden Roof represent the 9 types of Sakthi or Energies.

The 6 pillars at the Artha Mantapa represent the 6 types of Sashtras. 

The 18 pillars in the adjacant Mantapa represents 18 Puranams.


10) The dance of Lord Nataraja is described as Cosmic Dance by Western Scientists. 

Whatever Science is propounding now has been stated by Hinduism thousands of years ago !







जय श्री कृष्णा......

#LovemyIndia


22 Reasons To Believe ancient Bharat Is Based On Science

 वृक्ष #Neem and Banyan tree
People are advised to worship Neem and Banyan tree in the morning. Inhaling the air near these trees, is good for health.

 योग #Yoga aasan Pranayama
If you are trying to look ways for stress management, there can’t be anything other than Hindu Yoga aasan Pranayama (inhaling and exhaling air slowly using one of the nostrils).

 प्रतिष्ठान #temples- Moolasthanam
Hindu temples are built scientifically. The place where an idol is placed in the temple is called ‘Moolasthanam’. This ‘Moolasthanam’ is where earth’s magnetic waves are found to be maximum, thus benefitting the worshipper.


  तुलसी #Basil
Every Hindu household has a Tulsi plant. Tulsi or Basil leaves when consumed, keeps our immune system strong to help prevent the H1N1 disease.

 मन्त्र #Vedic mantras
The rhythm of Vedic mantras, an ancient Hindu practice, when pronounced and heard are believed to cure so many disorders of the body like blood pressure.

 तिलक #holy ash in their forehead
Hindus keep the holy ash in their forehead after taking a bath, this removes excess water from your head.


 कुंकुम #kumkum bindi
Women keep kumkum bindi on their forehead that protects from being hypnotised.


  हस्त ग्रास #Eating with hands might
Eating with hands might be looked down upon in the west but it connects the body, mind and soul, when it comes to food.


 पत्तल #leaf plate
Hindu customs requires one to eat on a leaf plate. This is the most eco-friendly way as it does not require any chemical soap to clean it and it can be discarded without harming the environment.banana; palash leaves



  कर्णछेदन #Piercing  ears
Piercing of baby’s ears is actually part of acupuncture treatment. The point where the ear is pierced helps in curing Asthma.


  हल्दी #turmeric
Sprinkling turmeric mixed water around the house before prayers and after. Its known that turmeric has antioxidant, antibacterial and anti-inflammatory qualities.


 गोबर #cow dung
The old practice of pasting cow dung on walls and outside their house prevents various diseases/viruses as this cow dung is anti-biotic and rich in minerals.


 गोमूत्र #cow urine
Hindus consider drinking cow urine to cure various illnesses. Apparently, it does balance bile, mucous and airs and a remover of heart diseases and effect of poison.

  शिक्षा #Education
The age-old punishment of doing sit-ups while holding the ears actually makes the mind sharper and is helpful for those with Autism, Asperger’s Syndrome, learning difficulties and behavioural problems.


 दिया  #diyas
Lighting ‘diyas’ or oil or ghee lamps in temples and house fills the surroundings with positivity and recharges your senses.


 जनेऊ #Janeu
Janeu, or the string on a Brahmin’s body, is also a part of Acupressure ‘Janeu' and keeps the wearer safe from several diseases.


 तोरण #Toran
Decorating the main door with ‘Toran’- a string of mangoes leaves;neem leaves;ashoka leaves actually purifies the atmosphere.


 चरणस्पर्श #Touching your elder’s feet
Touching your elder’s feet keeps your backbone in good shape.


 चिताग्नि #Cremation
Cremation or burning the dead, is one of the cleanest form of disposing off the dead body.


 ॐ #Om
 Chanting the mantra ‘Om’ leads to significant reduction in heart rate which leads to a deep form of relaxation with increased alertness.


 हनुमान चालीसा #Hanuman Chalisa
Hanuman Chalisa, according to NASA, has the exact calculation of the distance between Sun and the Earth.

 शंख #Shankh Dhwani
The ‘Shankh Dhwani’ creates the sound waves by which many harmful germs, insects are destroyed. The mosquito breeding is also affected by Shankh blowing and decreases the spread of malaria.





जय श्री कृष्णा......

What is the Bhagavad-Gita?


Few facts of Bhagavad Gita



The Bhagavad-Gita is the eternal message of spiritual wisdom from ancient India. The word Gita means song and the word Bhagavad means God, often the Bhagavad-Gita is called the Song of God.


Why is the Bhagavad-Gita called a song if it is spoken?
Because its rhyming meter is so beautifully harmonic and melodious when spoken perfectly.


What is the name of this rhyming meter?
It is called Anustup and contains 32 syllables in each verse.


Who originally spoke the Bhagavad-Gita?
Lord Krishna originally spoke the Bhagavad-Gita.

Where was the Bhagavad-Gita originally spoken?
In India at the holy land of Kuruksetra.


Why is the land of Kuruksetra so holy?
Because of benedictions given to King Kuru by Brahma that anyone dying in Kuruksetra while performing penance or while fighting in battle will be promoted directly to the heavenly planets.


Where is the Bhagavad-Gita to be found?
In the monumental, historical epic Mahabharata written by Vedavyasa.


What is the historical epic Mahabharta?
The Mahabharata is the most voluminous book the world has ever known. The Mahabharata covers the history of the earth from the time of creation in relation to India. Composed in 100,000 rhyming quatrain couplets the Mahabharata is seven times the size of the Illiad written by Homer.


Who is Vedavyasa?
Vedavyasa is the divine saint and incarnation who authored the Srimad Bhagavatam, Vedanta Sutra, the 108 Puranas, composed and divided the Vedas into the Rik, Yajur, Artharva and Sama Vedas, and wrote the the great historical treatise Mahabharata known as the fifth Veda. His full name is Krishna Dvaipayana Vyasa and he was the son of sage Parasara and mother Satyavati.


Why is the Mahabharata known as the fifth Veda?
Because it is revealed in the Vedic scripture Bhavisya Purana III.VII.II that the fifth Veda written by Vedavyasa is called the Mahabharata.


What are the special characteristics of the Mahabharata?
The Mahabharata has no restrictions of qualification as to who can hear it or read it. Everyone regardless of caste or social position may hear or read it at any time. Vedavyasa wrote it with the view not to exclude all the people in the worlds who are outside of the Vedic culture. He himself has explained that the Mahabharata contains the essence of all the purports of the Vedas. This we see is true and it is also written in a very intriguing and dramatically narrative form.


What about the Aryan invasion theory being the source of the Bhagavad-Gita?
The Aryan invasion theory has been proven in the 1990s not to have a shred of truth in it. Indologists the world over have realized that the Aryans are the Hindus themselves.


What is the size of the Bhagavad-Gita?
The Bhagavad-Gita is composed of 700 Sanskrit verses contained within 18 chapters, divided into three sections each consisting of six chapters. They are Karma Yoga the yoga of actions. Bhakti Yoga the yoga of devotion and Jnana Yoga the yoga of knowledge.


When was the Bhagavad-Gita spoken?
The Mahabharata confirms that Lord Krishna spoke the Bhagavad-Gita to Arjuna at the Battle of Kuruksetra in 3137 B.C.. According to specific astrological references in the Vedic scriptures, the year 3102 B.C. is the beginning of kali yuga which began 35 years after the battle 5000 years ago. If calculated accurately it goes to 5151years from today.


What is the opinion of western scholars from ancient times?
According to the writings of both the Greek and the Romans such as Pliny, Arrian and Solinus as well as Megastathanes who wrote a history of ancient India and who was present as an eyewitness when Alexander the Great arrived in India in 326 B.C. was that before him were 154 kings who ruled back to 6777 B.C. This also follows the Vedic understanding.


When was the Bhagavad-Gita first translated into English?
The first English edition of the Bhagavad-Gita was in 1785 by Charles Wilkins in London, England. This was only 174 years after the translation of the King James Bible in 1611.


Was the Bhagavad-Gita also translated into other languages?
Yes. The Bhagavad-Gita was translated into Latin in 1823 by Schlegel. It was translated into German in 1826 by Von Humbolt. It was translated into French in 1846 by Lassens and it was translated into Greek in 1848 by Galanos to mention but a few.


What was the original language of the Bhagavad-Gita?
The original language of the Bhagavad-Gita was classical Sanskrit from India.


Why is Srimad often written before the Bhagavad-Gita?
The word Srimad is a title of great respect. This is given because the Bhagavad-Gita reveals the essence of all spiritual knowledge.


Is history aware of the greatness of Srimad Bhagavad-Gita?
Historically many very extraordinary people such as Albert Einsten, Mahatma Gandhi, Dr. Albert Schweitzer, Herman Hesse, Ralph Waldo Emerson, Aldous Huxley, Rudolph Steiner and Nikola Tesla to name but a few have read Srimad Bhagavad-Gita and were inspired by its timeless wisdom.


What can be learned by the study of Srimad Bhagavad-Gita?
Accurate, fundamental knowledge about God, the ultimate truth, creation, birth and death, the results of actions, the eternal soul, liberation and the purpose as well as the goal of human existence.


जय श्री कृष्णा......

एक राजा का दरबार


एक राजा का दरबार लगा हुआ था,
क्योंकि सर्दी का दिन था
इसलिये राजा का दरवार
खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी
..
महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी
और उसपर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे
और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे..
..
उसी समय एक व्यक्ति आया
और प्रवेश माँगा व प्रवेश मिल गया
तो उसने कहा "मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ
और अपनी बात रखता हूँ
पर कोई परख नही पाता
सब हार जाते है और
मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ"..
अब आपके नगर मे आया हूँ
राजा ने बुलाया और कहा
"क्या बात है"
तो उसने दोनो वस्तुएं उस
कीमती मेज पर रख दीं..
वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल
समान आकार, समान रुप रंग,
समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख
समान था..
...
..
राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.
तो उस व्यक्ति ने कहा
हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है
लेकिन हैं भिन्न.
इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा
और एक है काँच का टुकडा
लेकिन रूप रंग सब एक है.
कोइ आज तक परख नही पाया
क़ि कौन सा हीरा है
और कौन सा काँच का टुकड़ा..
.
..
कोइ परख कर बताये की ये हीरा है
और ये काँच..
अगर परख खरी निकली
तो मैं हार जाऊंगा
और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.
पर शर्त यह है क़ि यदि कोइ
नहीं पहचान पाया
तो इस हीरे की जो कीमत है
उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी..
इसी प्रकार से मैं कइ
राज्यों से जीतता आया हूँ..
..
राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था..
..
हारने पर पैसे देने पडेगे
इसका कोई सवाल नही था,
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी इसका सबको भय था..
कोई व्यक्ति पहचान नही पाया..
..
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो मैने सब बाते सुनी है
और यह भी सुना है कि कोई परख नही पा रहा है एक अवसर मुझे भी दो..
..
एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की
मै तो जनम से अंधा हू
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं
और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही है..
राजा को लगा कि इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है
राजा ने कहा क़ि ठीक है..
तो तब उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया इसमे कौन सा हीरा है और कौन सा काँच....??
..
यही तुम्हें परखना है..
..
कथा कहती है कि उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच..
..
जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया..
और बोला "सही है आपने पहचान लिया..
धन्य हो आप...
.
...
अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ "
..
सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था
वह भी बहुत प्रसन्न हुआ
कि कम से कम कोई
तो मिला परखने वाला..
उस आदमी, राजा और अन्य
सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई
कि तुमने यह कैसे पहचाना
कि यह हीरा है और वह काँच..
..
उस अंधे ने कहा की
सीधी सी बात है मालिक
धूप मे हम सब बैठे है..
मैने दोनो को छुआ
..
जो ठंडा रहा वह हीरा .. .
जो गरम हो गया वह काँच...
.
.
.
..
जीवन मे भी देखना
जो बात बात मे गरम हो जाये,
उलझ जाये वह काँच
और
जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे वही हीरा है..!!



जय श्री कृष्णा......

final week of 2015




Smile : because it makes a difference ....


Cry : because holding those emotions in is bad for you ....


Laugh : because whats the point hiding happiness ?


Apologize : because you don't want to loose someone special ....


Love : because you should experience this feeling once in your lifetime ....


Hug :  because there's no better feeling than being wrapped up warmly by some one you love ....


Live : because you have only one life and today will never come back..!!!


Enjoy the final week of 2015




जय श्री कृष्णा......

एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये


एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे
 आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...
 उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें
 टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ...
 उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...
 आवाज आई ...
 फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये ,
 फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा
 अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ...
 फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ
 .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा ..
 सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...
 प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया
 इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....

 टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,

 छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और

 रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..

 अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ... ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ...

 यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे
 और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय
 नहीं रहेगा ...

 मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है
 ... बाकी सब तो रेत है ..
 छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ..

 अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ?

 प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...
 इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन
 अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।


जय श्री कृष्णा......

So no idea is stupid

Date: 02 - 07 - 1909
Divisional Railway Officer,
Sahibgunj,

Respected Sirs,
I am arrive by passenger train Ahmedpur station and my belly is too much swelling with jackfruit. I am therefore went to privy. Just I doing the nuisance that guard making whistle blow or train to go off and I am running with lotaah in one hand and dhoti in the next when I am fall over and expose all my shocking to man and female women on platform. I am got leaved at Ahmedpur station. This too much bad, if passenger go to make dung that dam guard not wait train five minutes for him. I am therefore pray your honour to make big fine on that guard for public sake. Otherwise I am making big report to papers.(ORIGINAL LETTER)

Your faithful Servant,
Okhil Chandra Sen

Okhil Babu wrote this letter to the Sahibganj divisional railway officer in 1909. It is on display at the Railway Museum in New Delhi. It was also reproduced under the caption Travellers Tales in the Far Eastern Economic Review.

Any guesses why this letter is of Historic Value?


It led to the introduction of TOILETS in trains in India...!!!!

So no idea is stupid and
Always speak up...
Howsoever bad  or good you may be at any language...




जय श्री कृष्णा......

Life Is A Gift Today

Life Is A Gift Today

Before you think of saying an unkind word, think of someone who can’t speak.

Before you complain about the taste of your food,think of someone who has nothing to eat.

Before you complain about your husband or wife–think of someone who is crying out to God for a companion.

Before you complain about your children–think of someone who desires children but they’re barren.

Before you argue about your dirty house, think of the people who are living in the streets.

Before whining about the distance you drive–think of someone who walks the same distance with their feet.

And when you are tired and complain about your job,think of the unemployed, the disabled and those who wished they had your job.

And when depressing thoughts seem to get you down,put a smile on your face and thank God you’re alive and still around.Life is a gift – Live it, Enjoy it, Celebrate it, and Fulfill it, meditate it.

 जय श्री कृष्णा......

Sunday, December 27, 2015

mango grove vs people activity


meaning full story:

Two men entered a mango grove. One of them sat and counted the number of trees. He studied the variations in their size, the number of branches, density of leaves and number of mangoes across the trees. He thought about where they would sell, what would be the cost, etc.

The other man simply ate a few mangoes, enjoyed himself and left!

If we continuously use our logic to analyze and judge and try to bring things under our control, we will miss the whole beauty of the existential miracles.

So don’t judge anything. Everything has something to teach us. Accept and celebrate the very existence of the world with the innocence of a child!"

जय श्री कृष्णा......

Dog vs owener friend

"Everything is Auspicious.

Everything is Auspicious THE whole of Existence is an auspicious happening.

We are part of Existence, so everything happening around us is also auspicious!

This is the truth of Existence. Nothing that happens in Existence is inauspicious.

Everything is only a blessing. If we understood this clearly, we can see everything as extraordinary. Everything will appear as a miracle.

One day a duck hunter went to the market to buy a bird retriever dog. To his amazement he found a dog that could walk on water! He immediately took it home.

He invited one of his friends to hunt the next day and took the dog with them.

When a flock of ducks came near, he took aim, fired and silently watched. The dog walked on the water and retrieved the bird.
He looked at his friend for a reaction but the friend remained silent.

He asked him, ‘Do you see anything unusual about my dog?’ The friend replied, ‘Yes, your dog is unable to swim.’

Miracles are continuously happening in front of our eyes, but we continuously miss them!

Only because we miss them, life itself appears to be dull.

When we start perceiving them, our entire life becomes a miracle.

In the whole world there are only two kinds of people.

The first kind will try to judge, criticize and develop the things happening in the world according to their ideas.

There is the other group which feels that whatever is happening is auspicious.

Whoever feels that whatever happens is auspicious, lives in eternal bliss, in celebration.

The other group continuously suffers because it tries to change things all the time.

Just accept and celebrate Existence with all its different dimensions and paradoxes. Everything has a message for us including death and disease.


जय श्री कृष्णा......

abcd of life

ज़िन्दगी A B C D है  यकीं नहीं 

A  ऐतबार
B भरोसा
C चाहत
D दोसती          
E इनायत
F फैसला   
G गम   
H हिम्मत   
I इंतज़ार   
J जरुरत   
K ख्याल
L लम्हे   
M मोहब्बत          
N नाराज़गी          
O उम्मीद   
P प्यार          
Q किस्मत    
R रिश्ते   
S समझौता          
T तमन्ना
U उदासियां          
V विरासत   
W वादा
X क्सचेंज
Y यादे।


इन सब फीलिंग्स से मिल कर  बनती है

Z ज़िन्दगी


जय श्री कृष्णा......

Saturday, December 26, 2015

विवाह प्रेम और सुख

विवाह प्रेम और सुख

पुरुष विवाह में उत्सुक ही नहीं है। पुरुष विवाह में फंसता है। स्त्री प्रेम में सीधी उत्सुक नहीं है। उसकी उत्सुकता विवाह में है। प्रेम चूंकि विवाह तक पहुंचाता है, इसलिये वह प्रेम में उतरती है। स्त्री की उत्सुकता स्थायित्व में है, पुरुष की उत्सुकता नवीनता में है। ये बड़ी कठिन बातें हैं। इनका हल होना मुश्किल है।

दो ही उपाय हैं: या तो स्त्री की बात मानकर पुरुष को दबाया जाये, जैसा कि अतीत सदियों में हुआ। हमने विवाह का आयोजन कर लिया, स्त्री की बात मान ली, पुरुष को दबा दिया। प्रेम शाश्वत है। और फिर बच्चों का भी सवाल है, फिर समाज की भी व्यवस्था है। स्त्री उसमें ज्यादा सहयोगी मालूम पड़ी क्योंकि स्थिरता लाती है। लेकिन पुरुष सब तरफ उदास हो गया। उसने हजारों तरह की वेश्यायें पैदा कर लीं। न मालूम कितनी तरह की अनीति पैदा हुई सिर्फ इसलिये, कि यह पुरुष के स्वभाव के अनुकूल नहीं पड़ा।

एक तो उपाय यह था, जो कि आज असफल हो गया है। अब दूसरा उपाय पश्चिम कर रहा है कि पुरुष की मान लो, कि स्थायित्व की फिक्र छोड़ दो, विवाह को जाने दो। या विवाह ज्यादा से ज्यादा एक सांयोगिक घटना है। जितनी देर चले, ठीक; जिस दिन न चले, समाप्त। जैसे विवाह कोई जीवन भर का निर्णय नहीं है, एक तात्कालिक क्षण की बात है। जब तक सुख दे ठीक, जिस दिन सुख बंद हो, समाप्त! इससे स्त्री दुखी होगी और स्त्री शोषित हो रही है क्योंकि उसकी तृप्ति नहीं होती। और दुनिया भर के मनसशास्त्री परेशान हैं कि क्या उपाय किया जाये! क्योंकि पुरुष तभी सुखी होंगे जब उन्हें पति न बनना पड़े और स्त्रियां तभी सुखी होंगी जब वे पत्नी बन जायें। अब इस विरोध को कैसे हल किया जाये? और एक दुखी होता है तो अंततः दूसरा भी दुखी हो जायेगा। दोनों ही सुखी हों तो ही सुखी हो सकते हैं। इसलिये अब तक कोई समाज सुखी नहीं हो पाया।

हां, पुरुष सुखी हो सकता है, अगर वह पुरुष की वासनाओं को गिरा दे। स्त्री सुखी हो सकती है, अगर वह स्त्री की वासनाओं को गिरा दे। लेकिन ऐसे लोग अकसर विवाह नहीं करते क्योंकि कोई जरूरत ही नहीं रह जाती। अगर बुद्ध जैसे लोग विवाह करें तो विवाह परम आनंद का होगा। लेकिन बुद्ध जैसे लोग विवाह नहीं करते। और जो विवाह करते हैं, उनके लिये विवाह नर्क का आधार बन जाता है।

जय श्री कृष्णा......

भारतीय परम्परा में अंक नौ का महत्व




9-nine

नौ की लकड़ी नब्बे ढुलाई, नौ दिन चले अढाई कोस, नौ नकद न तेरह उधार आदि लोकोक्तियों और मुहावरों की दुनिया से लेकर भारतीय धर्म, संस्कृति और ज्योतिष तक नौ के अंक की गहरी पैठ हैं।

जन्म कुण्डली के नवम भाव से मनुष्य के भाग्य धर्म और तीर्थयात्रा आदि का विचार किया जाता हैं। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू और केतु भारतीय ज्योतिष में नौ ग्रह हैं। शिशु को नौ महीने गर्भ में रहना पड़ता हैं। नौलखा हार की रौनक ही कुछ और होती हैं, इस हार को मनुष्य का शरीर ही धारण करता हैं। उसके नवधा अंग और नवद्वार हैं दो आँखे, दो कान, दो हाथ, दो पैर और एक नाक के नवधा अंग कहलाते हैं। दो आँखे, दो कान, दो नाक, एक मुख, एक गुदा और लिंग मिलाकर नवद्वार कहलाते हैं। चंद्रमास के दोनों पक्षों की नवी तिथि नवमी कहलाती हैं, भगवान राम का जन्म भी नवमी तिथि को हुआ।

अंक नौ में सभी अंको का समावेश माना जाता है। अंक शास्त्र में यह अंक सर्वाधिक बलवान अंक माना गया है इसमें तीन का गुणांक तीन बार आता है अर्थात 3+3+3 = 9 होता है।  इसलिए इस अंक के लोगों में रचनात्मकता और कल्पनाशक्ति बहुत अच्छी होती हैं। अंक नौ का स्वामी ग्रह मंगल होता है और मंगल के प्रभाव से आप बहुत साहसी और पराक्रमी व्यक्ति भी होते है।

इस अंक वाले जातक शारीरिक एवं मानसिक रूप से बलवान होते हैं। वीरता, साहसिक कार्य के प्रति निष्ठा, अपने निर्णयों पर अडिग रहने वाले, नेतृत्व करने वाले होते हैं। अनुशासन प्रिय होने के बावजूद इनके कनिष्ठ इनसे प्रसन्न रहते हैं क्योंकि दिल से ये सौम्य होते हैं। अपने जीवन साथी से इनके अक्सर मतभेद रहते हैं। स्वाभिमानी होने के कारण इनके मित्रों की संख्या कम होती है, इनकी हार्दिक इच्छा होती है कि ये जहां भी जाएं इन्हें महत्व जाये।

भारतीय परम्परा के अनुसार, चार युग हैं और इनके वर्षो का योग भी नौ ही हैं
सतयुग में 172,800 वर्ष बताएं गए हैं – (1+7+2+8 = 18 == (1+8 = 9)
त्रेतायुग में 129600 0 वर्ष बताएं गए हैं – (1+2+9+6 = 18 =  (1+8 = 9)
द्वापरयुग में 864000 वर्ष बताएं गए हैं – (8+4+6) = 18 = (1+8 = 9)
कलयुग में 432000 वर्ष बताएं गए हैं – (4+3+2) = 9

कुछ और तथ्य जो कि नौ के अंक को काफी महत्व देतें हैं, आइये देखते हैं – विद्वानों और शास्त्रकारों ने नौ के समूह में और क्या-क्या समेटा हैं –

नवरात्र – नवरात्र में पूजनीय नौ कुमारियां हैं जिनमें इन नौ कुमारियों की पूजा कि जाती हैं- कुमारिका, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, काली, चंडिका, शाम्भवी, दुर्गा और सुभद्रा। पुराण मत के अनुसार नौ दुर्गाएं जिनका नवरात्र में पूजन होता हैं वे इस प्रकार से हैं -शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्दिदात्री

नवरस – काव्य के नौ रस बताएं गए हैं जो इस प्रकार हैं – श्रंगार, करुण, हास्य, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अदभुत और शान्त इन रसों के स्थाई भाव इस प्रकार हैं- श्रंगार की रति, हास्य की हंसी, करुण का शुक, रौद्र का क्रोध, वीर का उत्साह, भयानक का भय, वीभत्स का जुगुप्सा, अदभुत का विस्मय और शान्त की शांति।

नवरत्न – हीरा, पन्ना, माणक, मोतीगोमेद, लहसुनिया, पदमराग, मूंगा और नीलम ये नवरत्न कहलाते हैं। सम्भव हैं राजा विक्रमादित्य को अपनी सभा में नवरत्न रखने की प्रेरणा हीरा, पन्ना आदि नवरत्नों के वैभव से मिली हों। विक्रमादित्य की सभा में नौ रत्न थे धन्वन्तरी, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखपर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि।

नवधातु – भारतीय परिप्रेक्ष में जो स्थान अष्टधातुओं अथवा उनसे निर्मित मूर्तियों का रहा हैं, वह भलें ही नवधातुओं न रहा हों लेकिन सोना, चांदी, लोहा, सीसा, तांबा, रांगा, इस्पात, कासां और कान्तिलोहा नवधातुयें कहलाती हैं।

नवविष – शास्त्रों में नौ प्रकार के विष बताएं गए हैं, जो नवविष के रूप में जाने जातें हैं -वत्सनाम, हारिद्रय, सक्तक, प्रदीपन, सौराष्ट्रिक, श्रंग्दक, कालकूट, हलाहल और ब्रह्मपुत्र हलाहल जैसा प्रचण्ड विष समुन्द्र मंथन के समय निकला था।



जय श्री कृष्णा......

be positive always

पानी को बर्फ में बदलने में वक्त लगता है ....
ढले हुए सूरज को निकलने में वक्त लगता है ....

थोड़ा धीरज रख,थोड़ा और जोर लगाता रह ....
किस्मत के जंग लगे दरवाजे को खुलने में वक्त लगता है ....

कुछ देर रुकने के बाद फिर से चल पड़ना दोस्त ....
हर ठोकर के बाद संभलने में वक्त लगता है ....

बिखरेगी फिर वही चमक तेरे वजूद से तू महसूस करना ....
टूटे हुए मन को संवरने में थोड़ा वक्त लगता है ....

जो तूने कहा कर दिखायेगा रख यकीन ....
गरजे जब बादल तो बरसने में वक्त लगता है ....

खुशी आ रही है और आएगी ही, इन्तजार कर ....
जिद्दी दुख-दर्द को टलने में थोड़ा वक्त लगता है ॥



जय श्री कृष्णा......

Fish vs God



एक मछली छोटे तालाब में अपने परिवार के साथ रहती थी तालाब में पानी कभी भी सुख जाता था तो उस परमपिता परमेश्वर को याद करती थी पूजा तप आदि खूब किया करती थी एक दिन तेज़ तूफ़ान और बारिश आयी जिससे मछली का परिवार बहकर नदी में बहने लगा और मछली ने व् उसके परिवार ने नदी के विपरीत दिशा में बहने की काफी कोशिश् की और थक हारकर नदी के प्रवाह में ही बहकर ईश्वर को खूब कोसा और भला बुरा कहा और कुछ दिन में ही समुन्दर में पहुच गये। और वहाँ जाकर उनको अहसास हुआ क़ि ईश्वर ने हमको दरीया से निकालकर विशालता में ला दिया उसने हमारे जीवन में तूफ़ान लाकर अपने विशाल स्वरुप से जोड़ दिया ।अत: हर पल उसकी रजा में राजी रहो वो पूरा समुन्दर दे रहा है और हम एक चम्मच लेकर खड़े है ।हम उसके हर कार्य के लिए कोसते रहते है negetive सोचते रहते है ।अपनी सोच बदलो हर पल positive सोचो एक माँ अपने बच्चे का एक पल के लिए भी बुरा नहीं सोच सकती तो फिर वो पालनहार कैसे बुरा क्ऱ सकता है|||


जय श्री कृष्णा......

Friday, December 25, 2015

body vs soul

शरीर और आत्मा की वार्तालाप


 :-सुबह के 5 बजे:-
आत्मा -चलो उठो साधना का समय हो गया है !
उठो ना !

शरीर -सोने दो न ! क्यों तंग कर रही हो ?

पता नहीं क्या रात को बहुत देर से सोया था.........

थोड़ी देर के बाद साधना करूँगा ।

आत्मा -बोली ठीक है और मन में सोचने लगी मुझे भूख लगी है और ये है क़ि समझता ही नहीं है

सुबह के 6:-बजे तो आत्मा बोली - अब तो उठ जाओ भाई !सूरज भी आपनी किरणे फैलाते हुए हमें उठा रहा है उठो नplzzzzz.


शरीर -कितना परेशान करती हो ! ठीक है उठ रहा हूँ बस 5 मिनट और सोने दो !

आत्मा छटपटाती हुई शरीर के इंतजार में कि ये कब उठेगा और कब मेरी भूख को शांत करेगा

!!!!!थोड़ी देर बाद साधना में बैठने के लिए शरीर ने वक्त निकाला ।

20-25 मिनट साधना में बैठा और आत्मा कुछ तृप्त ही हुई थी की शरीर उठ गया.......

आत्मा - अरे रे रे रे क्या हुआ क्यों उठ गए अभी तो मैं तृप्त हुई भी नहीं हूँ कि तुम उठ रहे हो !!!!!



क्या हुआ भाई ? कहाँ जा रहे हो ?

शरीर - अरे मुझे (ऑफिस or घर का ) काम पर जाना है तुम्हारी तो कुछ समझ में ही नहीं आता !!!!


आत्मा - ठीक है शाम को तो साधना करोगे न ?


शरीर - (परेशान होते हुए) हाँ भई हाँ ।

सारा दिन निकल गया, आत्मा भूख से
 तड़पते हुए ......

शाम हो गई आत्मा खुश हुई चलो अब तो मेरी भूख का निवारण हो ही जायेगा ...

शरीर ऑफिस और घर के काम से कुछ फ्री हुआ ही था की आत्मा आवाज देती है ।


आत्मा - अरे फ्री हो गए !
अब तो चल ही सकते हो साधना के लिए चलो न ।


शरीर -क्यों सारा दिन तंग करती रहती हो ?

देखती नहीं हो मैं अभी ऑफिस और घर के कामों से फ्री हुआ हूँ, थक गया हूँ ।

आत्मा - अरे तुम थके हुए हो तो साधना में जैसे ही बैठोगे तो तुम्हारी थकान चुटकी में दूर हो जाएगी ...


शरीर -नहीं अभी नहीं रात को पक्का बैठूँगा ।


शरीर की स्थिति- आँखें नींद में भरी हुई, थकान से बुरा हाल जैसे-तैसे आत्मा की ख़ुशी के लिए साधना में बैठे ....


आत्मा की कुछ भूख शांत हुई ही थी कि यहाँ शरीर की आँखे नींद से भर गई ..


शरीर उठा और सोने के लिए जाने ही लगा था क़ि ..


आत्मा बोल उठी -अरे अरे क्या हुआ क्यों उठ गए अभी बैठे ही थे की उठ भी गए ।

शरीर - मैं थक गया हूँ यार !!

कल सुबह को पक्का 5 बजे उठ के साधना करुगा .....

आत्मा - तुम फिर से बहाना बना रहे हो तुम नहीं उठोगे मुझे पता है ।

आत्मा दुखी होकर चुप हो गई तभी शरीर ने मोबाइल पर msg देखा।

शरीर - अरे ये तो मेरे best frd का msg
है चलो थोड़ी देर चैटिंग करके सोता हूँ ...

आत्मा सोचती है (मन ही मन)- देखो साधना के वक्त तो इसे नींद आ रही थी और अब देखो friends से बात करने के वक्त नींद ही गायब हो गई ।

जिसकी वजह से इसका अस्तित्व है उसी की ही परवाह नहीं है इसे
आत्मा - खैर चलो कल देखते है।

परंतु फिर वही दिनचर्या...
सुबह के 5 बजे से रात के वक्त तक और आत्मा भूखी की भूखी रह जाती है ।

Agree?

जय श्री कृष्णा......

Father vs son

मेरे कंधे पर बैठा मेरा बेटा जब मेरे कंधे पे खड़ा हो गया
मुझी से कहने लगा "देखो पापा में तुमसे बड़ा हो गया"

मैंने कहा "बेटा इस खूबसूरत ग़लतफहमी में भले ही जकडे रहना
मगर मेरा हाथ पकडे रखना"

"जिस दिन येह हाथ छूट जाएगा
बेटा तेरा रंगीन सपना भी टूट जाएगा"

"दुनिया वास्तव में उतनी हसीन नही है
देख तेरे पांव तले अभी जमीं नही है"

"में तो बाप हूँ बेटा बहुत खुश हो जाऊंगा
जिस दिन तू वास्तव में मुझसे बड़ा हो जाएगा
मगर बेटे कंधे पे नही ...
जब तू जमीन पे खड़ा हो जाएगा!!

ये बाप तुझे अपना सब कुछ दे जाएगा !
तेरे कंधे पर दुनिया से चला जाएगा !!




जय श्री कृष्णा......

monk and fellow


एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा। बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?
शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : हम अपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।
संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?
कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया।
वह बोले : जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं। वह आगे बोले, जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं। जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।
शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में ही बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़ जाएं कि वापिस आना ही मुमकिन न हो।


जय श्री कृष्णा......

"WHY ME", to "WOW ME"


"When a stone rolls in ganga, it nicely get shaped, and polished, and becomes Shivalinga, and left in the banks for the people to worship.

In the flow of life, we are also like, stones which is moving and rotating,in ganga.

Many corners where we need to be chiseled, it gets chiseled, those parts are removed, and wherever we need to be polished, the polishing happens.

If you think you are the small part which is getting chipped off, why me? Why me? Why me?

If you feel you are the larger part, getting polished, ‘wow’ “wow! Me” ,“wow! Me” ,“wow! Me” : “wow it’s me” “wow it’s me”


Life is just all about from "WHY ME", to "WOW ME"!!!"


 जय श्री कृष्णा......

Thursday, December 24, 2015

newly bride vs mother in law

एक नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में आई तो
उसकी सास बोली :
बींदणी कल माता के मन्दिर में चलना है।
बहू ने पूछा :
सासु माँ एक तो ' माँ ' जिसने मुझे जन्म दिया
और एक ' आप ' हो
और कोनसी माँ है ?
सास बडी खुश हुई कि मेरी बहू तो बहुत सीधी है ।
सास ने कहा - बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है सब औरतें
जायेंगी हम भी चलेंगे ।
सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है ।
आगे सास पीछे बहू ।
जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर
कहा :
माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है ,
मैं बाल्टी लाती
हूँ और दूध निकालते है ।
सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा कि बहू तो
" पागल " है और
बोली
बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नही दे
सकती।
चलो आगे।
मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी ।
फिर बहू ने कहा - माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा
सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया ।
और बोली - बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ?
चलो अंदर चलो मन्दिर में, और सास बोली -
बेटा ये माता है और इससे मांग लो , यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी ।
बहू ने कहा -
माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती
है ? ,
जब पत्थर की गाय दूध नही दे
सकती ?
पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता ?
पत्थर का शेर खा नही सकता ?
तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ?
अगर कोई दे सकती है तो आप ......... है
" आप मुझे आशीर्वाद दीजिये " ।
तभी सास की आँखे खुली !
वो बहू पढ़ी लिखी थी,
तार्किक थी, जागरूक थी ,
तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को
जाग्रत कर दिया !
अगर ईश्वर की प्राप्ति करनी है तो पहले
असहायों , जरुरतमंदों , गरीबो की सेवा करो
परिवार , समाज में लोगो की मदद करे ।
" मानव सेवा ही माधव सेवा है " ।
" कर्म ही पूजा है " - भगवत गीता
प्रत्येक मनुष्य में आत्म स्वरुप ईश्वर स्वयं विराजित है ।
इनमे ही प्रभु के दर्शन करे ।
बाकी
मंदिर , मस्जित , गुरुद्वारे तो मानसिक शांति
के केंद्र हैं
ना कि ईश्वर प्राप्ति के स्थान.....!

Agree?

जय श्री कृष्णा......


Guilt is the greatest sin.

"Guilt is the Greatest Sin"


At least other sins will punish you after death. Guilt punishes you when you are alive.

A guilty person can never be at ease with himself. He will always lack self-confidence. He will always look for a leader for guidance. This is where the society steps in and exploits him.

The moment you start feeling guilty about something you can be exploited.

Living Enlightenment is living with the intelligence of Consciousness instead of the guilt of conscience.

What is Guilt?

When you have desires you have guilt as well. Guilt is the opposite face of desire. Sometimes you feel guilty about desiring something because you feel it is not right to desire it. Other times you feel guilty when your desires are fulfilled because you feel you are not deserving of what you receive.

When your desires do not come true you feel guilty because you feel you have not done what you ought to have. Desires invariably lead to guilt.

Guilt is nothing but your past decisions and actions being reviewed with your updated intelligence.

For example when you were in school, you might have said a few mean things to one of your friends which caused a relationship to break. Now, this many years later, with the intelligence that you have, is it right to review that incident and feel guilty? No! At that time you had only that much intelligence, so you behaved in that fashion. Now, you have updated intelligence.
It doesn’t make sense to review the past with your present intelligence.

The Futility of the Past
What is gone is gone. What has been done is done. You cannot undo it.

Now if you constantly think about the past and feel guilty, you destroy your present and your future too.

Nothing can do done about it, so guilt is useless. What can you do?

All that you can do is not repeat the same pattern again, that’s all.

At that time with whatever intelligence you had, you acted, that’s all.

Our past is always past, it is always dead. That is why it is called past.

Yet, we always let the past affect us. How do we allow the past to affect us? In two ways,

1.If you review your past incidents or decisions using the present intelligence, you create guilt in your being.

2.If you take the present decisions based on past experiences, you will be repeating the same past into the future also, may be in a little updates fashion!
Even though you might not commit exactly the same mistake, you will be moving in the same experiential level, in the same plane.

Our mind falls into a groove, a track, a mindset that forces it to do what it has always done. So we keep making the same mistakes.

Three Kinds of Guilt that Kill our Intelligence

Three kinds of guilt take root in us and kill our intelligence:

1. Guilt created by immediate family – Before the age of seven, guilt is created by your immediate family. If you don’t do according to your parents’s wishes, they instill guilt in you. They tell you god did not approve of what you are doing. Poor god, he has to support whatever anyone says about him! Or your parents tell you should respect their wishes as parents. Immediately you feel guilty of making them unhappy. In this way, your family sows the first guilt in you. You in turn pass it on to your child.

A small child knows nothing of guilt – he is just wild and natural. He is total in whatever he does. That is why he is so full of energy. He is overflowing with joy and curiosity. The child wants to shout, dance and jump – that is his natural expression. But adults stop him, “Don’t shout! It is bad manners. You should be civilized. You should carry yourself well like us”. By and by the notion of being free and happy is itself associated with feeling of guilt.

2. Guilt created by Society – From age 7 to 14, society creates guilt in you through its rules.

The guilt based on fear is creates by social laws.
Society instills the guilt in you that you are not good enough. It makes you feel guilty for what you are, what you do. Once it convinces you that you are a sinner, you are caught in its grips. You cannot enjoy the joy of life anymore.

The Tibetan poet-saint Milarepa sang, “My religion is to live-and die-without regret.’.

You are called sinner or saint only by society. As long as society labels you a saint, you are a saint. The moment society labels you a sinner, you are a sinner.
Once you have the idea of guilt sown in you, you can be exploited easily by society.

A guilty person can never be at ease with himself.
Guilt is the first thing that society sows in you. The more you feel guilty, the more society becomes powerful.

The Dilemma of Natural Happiness v/s Society’s given Guilt

Guilt means you have done something which others don’t want you to do. If you don’t listen to the society and listen to your natural intelligence, you feel guilty of doing something wrong. You are afraid and start defending yourself. You even pretend you have not done it. Instead if you do something that others approve, you are not happy doing it because it is most often not what you naturally feel like doing. This is the dilemma you are caught in…

Guilt creates a dual personality, a schizophrenia in you – to the outside world you are one person and deep down inside yourself you are another.

Guilt is the wedge inserted into your inner space which makes you take on double standards.

3. Guilt Created by You – After 21, the guilt sown in you by family and society grow roots inside you. Then you start creating guilt inside yourself, without any reason. Guilt becomes a permanent guest in your being!

When you internalize guilt based on fear and greed, you create new types of guilt for yourself. The moment you start feeling guilty about something, you can be easily exploited. That too when you start fighting with yourself it is easier to exploit you.

If you look into your life you can see how every moment you are subtly looking for some reason to fight with yourself, to feel discontent with yourself. You cannot remain without some conflict, you want to create misery for yourself because that is what you have been taught – Happiness is a Sin.

Acceptance – The Beautiful Way Out of Guilt.

Acceptance is s wonderful too to relieve yourself of the pull and push between the past and the future.

With acceptance you fall into THE PRESENT straight away.

The first thing – is to accept all the happenings of the inner world and all the happenings in the outer world. Whatever problems you have in the outer world and in the inner world, JUST ACCEPT THEM IN THEIR ENTIRETY. Summarize all that you experience as problems and accept then in totality.

Accept all guilt, all mistakes, all failures; even if you cannot accept, accept that you cannot accept. You will then relax; guilt will drop from your mind.

Just try this small experiment:

Even if you cannot accept, accept that you cannot accept. You will then relax; guilt will drop from your mind.

Just relax for 3 days with complete acceptance. If you relax for 3 days without the pull and push in the inner world and outer world, you are going to lose all your wealth? Surely not!

So there is no problem. In 3 days you are going to lose anything? Why don’t you give it a try?

Just for 3 days, sincerely, utterly, accept everything in your life 100%. If you are not able to accept 100% then accept that you are not able to accept 100%. Even the acceptance of ‘I am not able to accept myself in the inner world and outer world’ will make you drop from the pull and push between the past and the future.

The moment you understand, ‘ I am not able to free myself from the pull and push of the desires and fears, I am not able to accept my reality’, that very understanding will start doing its job.

If you are not able to be sincere, accept that you are not able to be sincere. Even that sincerity is enough. You will start seeing a different space in you.

If you can fall into the PRESENT MOMENT, relaxing from the outer world and the inner world things, in 3 days you will have a GLIMPSE of ‘WHAT IS LIFE?” What does it mean to live in the PRESENT MOMENT?

If this happens in you, you will experience such ecstasy, such a different space, such different life that you have never experienced before.

You have lived based on your philosophy for last may be 30 years. Just for 3 days, don’t try to alter anybody in the outer world. You will see that when you experiment such great techniques, they work miracles in your being. They start a great alchemy process in your being.

Just accept yourself as you are, totally and unconditionally.

The total acceptance will bring about an active and intense relaxation in which your natural intelligence will flower.

Then the transformation will happen, the realization will happen of what you always were deep within you.

You will see that guilt will go and leave no trace behind that it ever existed."


जय श्री कृष्णा......


7 wonders of life


Seven Wonders of Life

1. Your Mother - Who is the first person to welcome you in this world.

2. Your Father - Who is the first person to go through all the hardships just to see you smile.

3. Your Sibling - The first person to teach you the art of 'sharing and caring'.

4. Your Friend - The first person to teach you how to respect people with different opinions and viewpoints.

5. Your Life partner - The first person to make you realize the value of sacrifice and compromise.

6. Your Children - The first little person to teach you how to be selfless and think about others before yourself.

7. Your Grandchildren - The only creatures who make you want to live the life, all over again ... !!

Radhekrishna...

man vs new born butterfuly




एक बार एक आदमी को अपने garden में टहलते हुए किसी टहनी से लटकता हुआ एक तितली का कोकून दिखाई पड़ा. अब हर रोज़ वो आदमी उसे देखने लगा , और एक दिन उसने notice किया कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया है. उस दिन वो वहीँ बैठ गया और घंटो उसे देखता रहा. उसने देखा की तितली उस खोल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश कर रही है , पर बहुत देर तक प्रयास करने के बाद भी वो उस छेद से नहीं निकल पायी , और फिर वो बिलकुल शांत हो गयी मानो उसने हार मान ली हो. इसलिए उस आदमी ने निश्चय किया कि वो उस तितली की मदद करेगा. उसने एक कैंची उठायी और कोकून की opening को इतना बड़ा कर दिया की वो तितली आसानी से बाहर निकल सके. और यही हुआ, तितली बिना किसी और संघर्ष के आसानी से बाहर निकल आई, पर उसका शरीर सूजा हुआ था,और पंख सूखे हुए थे. वो आदमी तितली को ये सोच कर देखता रहा कि वो किसी भी वक़्त अपने पंख फैला कर उड़ने लगेगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसके उलट बेचारी तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और उसे अपनी बाकी की ज़िन्दगी इधर-उधर घिसटते हुए बीतानी पड़ी. वो आदमी अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया की दरअसल कोकून से निकलने की प्रक्रिया को प्रकृति ने इतना कठिन इसलिए बनाया है ताकि ऐसा करने से तितली के शरीर में मौजूद तरल उसके पंखों में पहुच सके और वो छेद से बाहर निकलते ही उड़ सके. वास्तव में कभी-कभी हमारे जीवन में संघर्ष ही वो चीज होती जिसकी हमें सचमुच आवश्यकता होती है. यदि हम बिना किसी struggle के सब कुछ पाने लगे तो हम भी एक अपंग के सामान हो जायेंगे. बिना परिश्रम और संघर्ष के हम कभी उतने मजबूत नहीं बन सकते जितना हमारी क्षमता है. इसलिए जीवन में आने वाले कठिन पलों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखिये वो आपको कुछ ऐसा सीखा जायंगे जो आपकी ज़िन्दगी की उड़ान को possible बना पायेंगे.


जय श्री कृष्णा......



jhen story

झेन में कोई पाच सौ वर्ष पहले, एक बहुत अदभुत फकीर हुआ, बांकेई। जापान का सम्राट उसके दर्शन को गया। बड़ी चर्चा सुनी, बड़ी प्रशंसा सुनी, तो गया। सुना उसने कि दूर दूर पहाड़ पर फैली हुई मोनेस्ट्री है, आश्रम है। कोई पांच सौ भिक्षु वहां साधना में रत हैं। तो गया। बांकेई से उसने कहा, एक एक जगह मुझे दिखाओ तुम्हारे आश्रम की, मैं काफी समय लेकर आया हूं। मुझे बताओ कि तुम कहा कहा क्या क्या करते हो? मैं सब जानना चाहता हूं।

आश्रम के दूर दूर तक फैले हुए मकान हैं। कहीं भिक्षु रहते हैं, कहीं भोजन करते हैं, कहीं सोते हैं, कहीं स्नान करते हैं, कहीं अध्ययन करते हैं कहीं कुछ, कहीं कुछ। बीच में आश्रम के सारे विस्तार के बीच एक बड़ा भवन है, स्वर्ण शिखसे, से मंडित एक मंदिर है।

बांकेई ने कहा, भिक्षु जहां जहां जो जो करते है, वह मैं आपको दिखाता हूं। फिर वह ले चला। सम्राट को ले गया भोजनालय में!

और कहां, यहां भोजन करते हैं। ले गया स्नानगृहों में कि यहां स्नान करते है भिक्षु। ले गया जगह जगह। सम्राट थकने लगा। उसने कहा कि छोड़ो भी, ये सब छोटी छोटी जगह तो ठीक हैं, वह जो बीच में स्वर्ण शिखरों से मंडित मंदिर है, वहां क्या करते हो? वहां ले चलो। मैं वह देखने को बड़ा आतुर हूं।

लेकिन न मालूम क्या हो कि जैसे ही सम्राट उस बीच में उठे शिखर वाले मंदिर की बात करे, बांकेई एकदम बहरा हो जाए, वह सुने ही न। एक दफा सम्राट ने सोचा कि शायद चूक गया, खयाल में नहीं आया। फिर दुबारा जोर से कहा कि और सब बातें तो तुम ठीक से सुन लेते हो! यह स्नानगृह देखने मैं नहीं आया, यह भोजनालय देखने मैं नहीं आया, उस मंदिर में क्या करते हो? लेकिन बांकेई एकदम चुप हो गया, वह सुनता ही नहीं। फिर घुमाने लगा यहां यह होता है, यहां यह होता है।

आखिर वापस द्वार पर लौट आए उस बीच के मंदिर में बांकेई नहीं ले गया। सम्राट घोड़े पर बैठने लगा और उसने कहा, या तो मैं पागल हूं या तुम पागल हो। जिस जगह को मैं देखने आया था, तुमने दिखाई ही नहीं। तुम आदमी कैसे हो? और मैं बार बार कहता हूं कि उस मंदिर में ले चलो, वहा क्या करते हैं? तुम एकदम बहरे हो जाते हो। सब बात सुनते हो, इसी बात में बहरे हो जाते हो!

बांकेई ने कहा, आप नहीं मानते तो मुझे उत्तर देना पड़ेगा। आपने कहा, वहां वहां ले चलो, जहां जहां भिक्षु कुछ करते हैं, तो मैं वहां वहां ले गया। वह जो बीच में मंदिर है, वहां भिक्षु कुछ भी नहीं करते। वहा सिर्फ भिक्षु भिक्षु होते हैं। वह हमारा ध्यान मंदिर है, मेडिटेशन सेंटर है। वहा हम कुछ करते नहीं, सिर्फ होते हैं। वहा डूइंग नहीं है, वहां बीइंग है। वहां करने का मामला नहीं है। वहा जब करने से हम थक जाते हैं और सिर्फ होने का आनंद लेना चाहते है, तो हम वहां भीतर जाते है। अब मेरी मजबूरी थी, आपने कहा था, क्या करते है, वहां ले चलो।

अगर मैं उस भवन में ले जाता, आप पूछते कि भिक्षु यहां क्या करते है, तो मै क्या कहता? और नहीं करने की बात आप समझ सकते, इसकी मुझे आशा नहीं है। अगर मैं कहता, ध्यान करते हैं, तो भी गलती होती, क्योंकि ध्यान कोई करना नहीं है, ध्यान कोई एक्शन नहीं है। अगर मैं कहता, प्रार्थना करते हैं, तो भी गलती , होती; क्योंकि प्रार्थना कभी कोई कर नहीं सकता, वह कोई एक्ट नहीं है, भाव है। तो मैं मुश्किल में पड़ गया, इसलिए मुझे मजबूरी में बहरा हो जाना पड़ा। फिर मैंने सोचा, बजाय गलत बोलने के यही उचित है कि आप मुझे पागल या बहरा समझकर चले जाएं।

झेन कहता है, ध्यान अर्थात न करना। इस न करने में ही वह जाना जाता है, जो है।  झेन बात नहीं करता ब्रह्म की। क्योंकि झेन का कहना यह है कि जब तक ध्यान नहीं, जब तक ज्ञान नहीं, तब तक ब्रह्म की बात व्यर्थ है। और जब ज्ञान हुआ, ध्यान हुआ, तब. भी ब्रह्म की बात व्यर्थ है। क्योंकि जिसे हमने नहीं जाना, उसकी बात क्या करें! और जिसे हमने जान लिया, उसकी बात की क्या जरूरत है! इसलिए झेन चुप है, वह मौन है; वह ब्रह्म की बात नहीं करता।


जय श्री कृष्णा......


Wednesday, December 23, 2015

सुंदर स्त्री

सुंदर स्त्री आभूषणों से मुक्त हो जाती है;
कुरूप स्त्री कभी भी
आभूषणों से मुक्त नहीं हो सकती।
सुंदर स्त्री सरल हो जाती है;
कुरूप स्त्री कभी भी नहीं हो सकती।

क्योंकि उसे पता है,
आभूषण हट जाएं,
बहुमूल्य वस्त्र हट जाएं,
सोना-चांदी हट जाए,
तो उसकी कुरूपता ही प्रकट होगी।
वही शेष रह जाएगी,
और तो वहां कुछ बचेगा न।
सुंदर स्त्री को आभूषण शोभा देते ही नहीं,
वे थोड़ी सी खटक पैदा करते हैं
उसके सौंदर्य में।

क्योंकि कोई सोना कैसे
जीवंत सौंदर्य से महत्वपूर्ण हो सकता है?
हीरे-जवाहरातों में होगी चमक,
लेकिन जीवंत सुंदर आंखों से उनकी क्या,
क्या तुलना की जा सकती है?

जैसे ही कोई स्त्री सुंदर होती है,
आभूषण-वस्त्र का दिखावा कम हो जाता है।
तब एक्झिबीशन की वृत्ति कम हो जाती है।
असल में, सुंदर स्त्री का लक्षण ही यही है
कि जिसमें प्रदर्शन की कामना न हो।
जब तक प्रदर्शन की कामना है
तब तक उसे खुद ही पता है
कि कहीं कुछ असुंदर है,
जिसे ढांकना है, छिपाना है,
प्रकट नहीं करना है।
स्त्रियां घंटों व्यतीत करती हैं दर्पण के सामने।
क्या करती हैं दर्पण के सामने घंटों?
कुरूपता को छिपाने की चेष्टा चलती है;
सुंदर को दिखाने की चेष्टा चलती है।

ठीक यही जीवन के सभी संबंधों में सही है।
अज्ञानी अपने ज्ञान को दिखाना चाहता है।
वह मौके की तलाश में रहता है;
कि जहां कहीं मौका मिले,
जल्दी अपना ज्ञान बता दे।
ज्ञानी को कुछ अवसर की तलाश नहीं होती;
न बताने की कोई आकांक्षा होती।
जब स्थिति हो कि उसके ज्ञान की
कोई जरूरत पड़ जाए,
जब कोई प्यास से मर रहा हो
और उसको जल की जरूरत हो
तब वह दे देगा।
लेकिन प्रदर्शन का मोह चला जाएगा।

अज्ञानी इकट्ठी करता है
उपाधियां कि वह एम.ए. है,
कि पीएच.डी. है, कि डी.लिट. है,
कि कितनी ऑननेरी डिग्रियां उसने ले रखी हैं।
अगर तुम अज्ञानी के घर में जाओ
तो वह सर्टिफिकेट दीवाल पर लगा रखता है।
वह प्रदर्शन कर रहा है कि मैं जानता हूं।

लेकिन यह प्रदर्शन ही बताता है
कि भीतर उसे भी पता है
कि कुछ जानता नहीं है।
परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हैं,
प्रमाणपत्र इकट्ठे कर लिए हैं।

लेकिन जानने का न तो
परीक्षाओं से संबंध है,
न प्रमाणपत्रों से।
जानना तो जीवन के अनुभव से संबंधित है।
जानना तो जी-जीकर घटित होता है,
परीक्षाओं से उपलब्ध नहीं होता।
परीक्षाओं से तो इतना ही पता चलता है
कि तुम्हारे पास अच्छी यांत्रिक स्मृति है।
तुम वही काम कर सकते हो
जो कंप्यूटर कर सकता है।
लेकिन इससे बुद्धिमत्ता का
कोई पता नहीं चलता।
बुद्धिमत्ता बड़ी और बात है;
कालेजों, स्कूलों और
विश्वविद्यालयों में नहीं मिलती।
उसका तो एक ही विश्वविद्यालय है,
यह पूरा अस्तित्व।
यहीं जीकर, उठ कर, गिर कर,
तकलीफ से, पीड़ा से, निखार से,
जल कर आदमी धीरे-धीरे निखरता है,
परिष्कृत होता है।



जय श्री कृष्णा......